Ayurveda: South Asia Specific Diseases (2)
Transcription (Hindi)
जैसे धात जाणां, परवेह रोग में आता है ये, धात, स्वपनदोष, शीघ्रपतन, मन की कमजोरी, वीर्य का पतला, ये सारा लीवर की गरमी की वजह से होवै है... लीवर की गरमी शांत कर दो, सारे रोग अपने आप समन हो जांगे... और जब वीर्य की पूर्ति हो जा गी, दीवे मैं तेल होगा तो अपने आप बलैगा... है ना... नपुंसकता भी अपने आप चली जायेगी... तो मरीज आते रहते हैं इस किसम के, आजकल, ये मरीज आस्सी परसैंट के लगभग हो रे हैं... क्यूं, खाणे-पीणे से तो ऐसे है, परहेज करते नहीं, ज्यादा-ज्यादा गरम चीज खावैं हैं, उनसे धातु पतली, वैसे जब हम ये सब्जी वगैरहा बोवैं हैं, गेहूं बो दिये, नीचचै खाद बो दिया, सपरे कर दिया और सब्जी बो दी, सपरे कर दिया... जहरीले सारे ये विषैली चीज हैं... वैसे धुल तो जां हैं पर उनका अंश है वो मानस के अंदर तो जा गा... वो ही बीमार करैगा... पहले इनका छिड़काव नहीं था, पहले ज माने में... ना तो इतनी ये प्वाएजन थे, ना इतनी ये बीमारी थी... जब, जब जल्दी इलाज हो जाया करता... अब इलाज होने में बड़ी कठिनाई हो जा है... परहेज करते नहीं मानस... तो ऐसा है जी, जैसा खावै अन्न, वैसा हो जाये मन... ठीक है ना जी... तो जैसा खाना खांवगे उसा शरीर का तासीर हो जा गा... उसी के अनुसार फिर इलाज करना पड़ता है...
एक आखिरी प्रश्न आपसे करूं...
हां...
कि आपने अपने घर के पीछे...
हां-हां...
ये करते हैं, ये जो पूरा बाग लगाया हुआ है, यहां पर आपने औषधियां लगाई हुई हैं, ये क्यूं लगाया? किस कारणवश लगाया? और ये कब से आपने पनपाना शुरू किया है?
ये जी सन् 1970 में मेरे पिताजी ने चालू किया था, जड़ी-बूटी लगाना उन्होंने किया था... शौक है हमारे को, आ कै भई लोगों की सेवा होई जा... और साथ में क्या जा गा, कुछ नहीं जाता... वहां ऊपर जां गे तो भजन पूछेंगे, क्या, क्या सेवा करी तैन्नै लोगों की... नू ना पूछैं कितना जोड के आया था... नू ना पूछैं कितना जोड के धर के आया था... ना, क्या करा... तो ये लोगों की, जिनकी रक्षा के लिये हमने जड़ी-बूटी लगाई...
ये दोबारा करेंग, अभी जोर की आवाज़ आई थी...
अच्छा जी...
तो ये आपने पीछे बाग लगाया है औषधी का, जो आप उगाते हैं, इसके बारे में हमें कुछ बताइये...
इसके बारे में ये है जी, सन् 1970 में मेरे पिताजी ने जड़ी-बूटी लगानी शुरू करी थी... ये हमने अपने लिये नहीं, मरीजों के लिये, जो लोग दुखी हैं संसार मैं, उनका फायदा हो, जड़ी-बूटी हम अकेले थोड़ा खांवगे, ये तो हमने बडे इलाज के लिये, आयुर्वेदिक बगीचा बनाने का मैनै शौक है... मेरे को कोई भी आयुर्वेदिक जड़ी-बूटी मिल जा मैं लगा दूं हूं... इनसे मैं मरीजों का इलाज करता हूं... कुछ तो फ़ायदा हो... जो बाजार से मोल लावैं हैं, उनका तो बचत हो जा गी... इसलिये मैं ये जड़ी-बूटी मैननै बाग मैं पीछे लगा राकखी है... और आगे लगाता रहूंगा... मेरे को कहीं भी, कोई भी, कहीं भी जाऊं हूं मैं, भई कोई जड़ी-बूटी का, पौधा मिल जा है, मैं वहां से ला कै लगा दूं हूं... कुछ तो फ़ायदा हो जा है... फ्री भी दे सकते हैं हम उसको... हैं, क्यूं अपनी खेत की उगाई हुई है... डॉक्टर तो कह दे है, म्हारे घर मैं बूवै है, हम कह दे हैं भई हमनै बू रकखी है... ले जा, तेरा फायदा हो जा तै, अच्छी ही बात है... तो इसलिये मैंने ये जड़ी-बूटी उगा रकखी है...
एक और प्रश्न, आप ये कार्य कर रहे हैं...
हां जी...
तो आगे इस चीज को बढ़ाने के लिये, क्यूंकि आपके जाने के बाद इसको कौन संभालेगा? आपने ये निर्धारित किया है?
देखो जी, लड़का है मेरा, सोलह साल हो गये इसको करते हुये... वैसे मैंनै इसकी भी वैद्य विशारद करवा दी... वैद्य विशारद करवा दी थी इसकी मैंनै... तो बात ये है के वैसे, जड़ी, इसमें जड़ी-बूटी है जो इसमें कोई ख़तरा तो है ना, रियैक्शन-पियैक्शन का कोई खतरा नहीं है... पर आजकल सखताई ऐसी चल रही है, भई काग जात, गाजर फरना चाहिये, काग जात तो जरूर चाहिये... देखो जी, सोलह साल हो गये लड के नै करते होये और मैं तो ये चाह रहा हूं, वैसे तो, गुजारा तो हमारी, भगवान की दया से ठीक चल रहा है, पर ये है, बड़े-बूढ़े नै, बिचारे नै, बूढ़े आदमी नै, के बेरा किस-किसके पैर दबाये, किस-किस के हाडे खाये... रिवाड़ी तक रात-दिन, एक दिन साईकिल पर भिवानी चला गया एक नुस्खा पूचछन खातर, एक दिन गाजियाबाद चला गया, एक, किसी मात, मां के पास... उसनै, उन्होंने, मेरे पिताजी ने अपनी किताब हाथ से लिखी है, ये किताब अपने हाथ की बनाई हुई है उसनै, इसनै इतनी कीमती चीज, मैहनत की... मैं तो चाहूं हूं, चलता ही रहै तो ठीक है... लोग-बाग की सेवा होये जा और म्हारा भी गुजारा चले जा... ये मेरे पिताजी नै अपने हाथ की किताब... और ये, भरतपुरिया, जो राजा मानसिंह था, ये, उनके गुरुजी थे जो, महात्मा जी, (खांसी) के हाथ की, ये हाथ की लिखी हुई किताब उनकी है, महात्मा जी की है... ये जो जंगल मैं आया करै थे मूर्थल अड्डे के ऊपर सिर्फ एक कोठडी थी, हैं जी, वो राजा का, उसका बिजली का हंट दिया था, एक ईनाम मैं मोतियां की माला थी, चांददी की जूती थी, सोने के घुंघरू थे, महात्मा जी यहां रहा करते थे... ये उनकी किताब है, हाथ की लिखी हुई, कितनी पुरानी...
(अस्पष्ट शब्द)
हैं, हां... नाड़ी कैसे चलती है...
हां, वो ये बाईट पर जायेगा...
हां...
हां, सवाल बताईये एक बार... जो ये नाड़ी देखकर आप रोगों का पता करते हैं...
हूं...
तो हर, जो आप वात की बात करते हैं...
हां-हां, वायु, वित और कफ, तीन दोष होते हैं द्यारीर में...
ये कैसे, कैसे चलती है नाड़ी...
Exercise (Hindi)
लीवर की गरमी की वजह से कौन कौन से रोग होते हैं?
1 स्वप्नदोष
2 शीघ्रपतन
3 सब
4 मन की कमज़ोरी
वैद्य जी के अनुसार बीमारी क्यों बढ़ गई हैं?
1 मरीज़ कसरत नहीं करते हैं
2 मरीज़ मीठा बहुत खाते हैं
3 सब्ज़ी और अन्न को बोते हुए खाद को मिलाने की वजह से
4 मरीज़ फ़ास्ट फ़ूड ज़्यादा खाते हैं
वैद्य जी जड़ी बूटी क्यों लगाते हैं?
1 आयुर्वेदिक बगीचा लगाने का शौक है
2 लोगों का भला हो जाता है
3 सभी वजह से
4 लोगों को फ़्री में भी दे देते हैं
वैद्य जी के बाद यह कार्य कौन संभालेगा
1 बेटी
2 बीबी
3 बेटा
4 सहयोगी
Transcription (Urdu)
جیسے چھات جانن، پرویہ روگ میں آتا ہے یہ، تھات، سوپندوش، شیدھپتن، من کی کمزوری، ویر کا پتلا، یہ سارا لیور کی گرمی کی وجہ سے ہووے ہے۔۔۔ لیور کی گرمی شانت کر دو، سارے روگ اپنے آپ سمن ہو جانگے۔۔۔ اور جب ویریہ کی پوت ہو جا گی، دیوے میں تیل ہوگا تو اپنے آپ بلیگا۔۔۔ ہے نا۔۔۔ نپنسکتا بھی اپنے آپ چلی جائیگی۔۔۔ تو مریض آتے رہتے ہیں اس قسم کے، آج کل، یہ مریض اسّی پرسینٹ کے لگ بھگ ہو رے ہیںَ۔۔ کیوں، کھانے پینے سے تو ایسے ہے، پرہیز کرتے نہیں، زیادہ زیادہ گرم چیز کھاویں ہیں، ان سے دھاتو پتلی، ویسے جب ہم یہ سبزی وغیرہ بوویں ہیں، گیہوں بو دئے، نیچے کھاد بو دیا، سپرے کر دیا اور سبزی وہ دی، ، سپرے کر دیا۔۔۔ زہریلے سارے یہ وسیلی چیز ہیں۔۔۔ ویسے دھول تو جاں ہیں پر ان کا انش ہے وہ مانس کے اندر تو جا گا۔۔۔ وہ ہی بیمار کریگا۔۔۔ پہلے ان کا چھڑکاو نہیں تھا، پہلے جو مانے میں۔۔۔ نہ تو اتی یہ پوئزن تھے، نہ تو اتنی یہ بیماری تھی۔۔۔ جب، جب جلدی آرام۔۔۔ جلدی علاج ہو جایا کرتا۔۔۔ اب علاج ہونے میں بڑی کٹھنائی ہو جا ہے۔۔۔ پرہیز کرتے نہیں مانس۔۔۔ تو ایسا ہے جی، جیسا کھاوے انن، ویسا ہو جائے من۔۔۔ ٹھیک ہے نہ جی۔۔۔ تو جیسا کھانا کھاونگے اسا شریر کا تاثیر ہو جا گا۔۔۔ اسی کے انوسار پھر علاج کرنا پڑتا ہے۔۔۔
Exercise (Urdu)
لیور کی گرمی کی وجہ سے کون کونسے روگ ہوتے ہیں؟
1 سوپندوش
2 شدھرپتن
3 سب
4 من کی کمزوری
ویدیہ جی کے مطابق بیماریاں کیوں بڑھ گئی ہیں؟
1 مریض کسرت نہیں کرتے ہیں
2 مریض میٹھا بہت کھاتے ہیں
3 سبزی اور ان کے بوتے ہوئے کھاد کو ملانے سے
4 مریض فیسٹ فوڈ بہت زیادہ کھاتے ہیں
Vocabulary (Hindi)
|
Spilling semen |
धात जाणां |
|
|
परवेह रोग |
|
Metal |
धातु |
|
|
स्वप्नदोष |
|
Premature ejaculation |
शीघ्रपतन |
|
Weakness of mind |
मन की कमजोरी |
|
Semen being too diluted |
वीर्य का पतला |
|
Liver inflammation |
लीवर की गरमी |
|
|
वीर्य की पूर्ति |
|
Impotency |
नपुंसकता |
|
Patient |
मरीज |
|
Avoid |
परहेज |
|
Idiom -- one's mood is dependent on the kind of food one eats |
जैसा खावै अन्न, वैसा हो जाये मन |
Vocabulary (Urdu)
|
Spilling semen |
دھات جاگاں |
|
|
پرویہ روگ |
|
Metal |
دھاتو |
|
|
سوپندوش |
|
Premature ejaculation |
سیشھرپتن |
|
Weakness of mind |
من کی کمزوری |
|
Semen being too diluted |
ویریہ کا پتلا |
|
Liver inflammation |
لیور کی گرمی |
|
|
ویریہ کی پورتی |
|
Impotency |
نپنسکتا |
|
Patient |
مریض |
|
Avoid |
پرہیز |
|
Idiom -- one's mood is dependent on the kind of food one eats |
جیسا کھاوے انن، ویسا ہو جائے من |

